Monday, September 19, 2011

हिंदी दिवस के अवसर पर आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी द्वारा वर्ष २०११ के लिए तेलुगु भाषी हिंदी युवा लेखक पुरस्कार डॉ.पी.श्रीनिवास राव जी को प्रदान किया गया है ....



हिंदी दिवस के अवसर पर आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी द्वारा हिंदी भाषा के विकास के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले  व्यक्तियों का सम्मान किया गया है.. जिसमें  वर्ष २०११ के लिए कडारु.मल्ल्या जी को पद्मभूषण  डॉ. मोटूरी सत्यनारायण पुरस्कार के अंतर्गत एक लाख रुपयें नकद पुरस्कार आन्ध्र प्रदेश राज्य के उपमुख्या मंत्री         श्री .दामोदर राजनरसिम्हा  एवं हिंदी अकादमी के अध्यक्ष श्री . लक्ष्मी प्रसाद जी ने प्रदान किया है ...



 तेलुगु भाषी हिन्दी युवा लेखक पुरस्कार के लिए पच्चीस हज़ार रुपये नकद पुरस्कार एवं ज्ञापिका  
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के दूरस्थ शिक्षा निदेशालय के सहायक निदेशक श्री.पी .श्रीनिवास राव जी को प्राप्त हुआ है ..
इस अवसर पर 
गुरुवर श्री .कडारु मल्ल्या जी को एवं  श्री डॉ.पी. श्रीनिवास राव जी को हार्दिक शुभकामनाएँ!!!!!


विडियो भाग 




.....चित्रावाली .....




स्वतंत्र वार्ता १५ सितम्बर ...




Tuesday, August 30, 2011

आंधप्रदेश राज्य हिंदी अकादमी साहित्य पुरस्कार २०११






आंधप्रदेश राज्य हिंदी अकादमी साहित्य पुरस्कार  २०११ 

पुरस्कारों के लिए हिंदी साहित्यकार चयनित!! 

युवा हिंदी लेखक पुरस्कार  के लिए दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के दूरस्थ शिक्षा निदेशालय के निर्देशक 

Monday, June 20, 2011

अज्ञेय जन्मशती समारोह

अज्ञेय जन्मशती समारोह  के सन्दर्भ में हिंदी से तेलुगु में अनूदित कविता पठन!!!!
हिंदी मूल "सबेरे उठा तो "का तेलुगु अनुवाद 

Tuesday, May 3, 2011

दूरस्थ शिक्षा क्षेत्रीय कार्यालय में डॉ त्रिभुवन राय का विशेष व्याख्यान

"भारतीय दृष्‍टि से साहित्य की आत्मा रस है जिसका आधार मनुष्य के हृदय में स्थित विभिन्न भाव होते हैं। जन्मजात संस्कार के रूप में प्राप्‍त प्रेम और हास जैसे भाव ही परिपक्व होकर रस के रूप में अभिव्यक्‍त होते हैं। हमारे दार्शनिकों ने रस को आनंद रूप और रसानुभूति को ब्रह्‍म की अनुभूति के समक्ष माना है। इसके लिए यह भी स्पष्‍ट किया है कि रस का अधिकारी अथवा पात्र वह सामान्य मनुष्य होता है जिसके भीतर आस्वादन की आकांक्षा होती है। ऐसा सहृदय ही रस का मानसिक साक्षात्कार करता है और रसानुभूति के क्षण में अपनेपन, पराएपन और तटस्थता से परे निर्वैयक्‍तिकता जैसी चौथी स्थिति में रहता है। इस तनमयता से ही लोकोत्तरता प्राप्त होती है जिससे निर्मल मन वाले सहृदय को आनंद का अनुभव होता है। यह अवस्था चित्त के द्रवित होने की अवस्था होती है।"



 ये विचार मुंबई से पधारे वरिष्‍ठ काव्यशास्त्रीय विद्वान प्रो.त्रिभुवन राय ने यहाँ उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के अंतर्गत सक्रिय दूरस्थ शिक्षा निदेशालय के क्षेत्रीय कार्यालय में आयोजित विशेष व्याख्यानमाला के क्रम में ‘रसानुभूति का स्वरूप’ विषय पर दूरस्थ माध्यम के स्नातकोत्तर के अधयेताओं को संबोधित करते हुए प्रकट किए। विशेष व्याख्यान की अध्यक्षता प्रो.ऋषभदेव शर्मा ने की तथा संचालन सहायक निदेशक डॉ.पेरिसेट्टि श्रीनिवास राव ने किया। 

                इस अवसर पर निदेशालय की ओर से अध्यक्ष और मुख्य वक्‍ता का सम्मान किया गया। व्याखान पर परिचर्चा में डॉ.पूर्णिमा शर्मा, डॉ.मृत्युंजय सिंह, डॉ.जी.नीरजा, डॉ.गोरखनाथ तिवरी, डॉ.साहिरा बानू, डॉ.लक्ष्मीकांतम, अकबर, संगीता, राज्यलक्ष्मी, हेमंता बिष्ट, संध्या रानी ने  सक्रिय रूप से भागीदारी निभाई।






[प्रस्तुति -डॉ जी नीरजा ]

Monday, April 25, 2011

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा में दूरस्थ शिक्षा का संपर्क कार्यक्रम उद्घाटित


हैदराबाद, 24.04.2011 (प्रेस विज्ञप्ति)।
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा द्वारा संचालित दूरस्थ शिक्षा  निदेशालय के क्षेत्रीय कार्यालय के तत्वावधान में आज यहाँ एम.ए. हिंदी और स्नातकोत्तर अनुवाद डिप्लोमा के दूरस्थ माध्यम के अध्ययनकर्ताओं के लिए सातदिवसीय संपर्क कार्यक्रम-सह-व्याख्यानमाला का उद्घाटन समारोह सभा के खैरताबाद स्थित परिसर में आयोजित किया गया।

दूरस्थ शिक्षा  निदेशालय के सहायक निदेशक डॉ. पी. श्रीनिवास राव ने यह जानकारी दी कि इस कार्यक्रम में विभिन्न विषय विशेषज्ञ आंध्र प्रदेश  के अलग-अलग अंचलों से आए हुए छात्रों की अध्ययन संबंधी कठिनाइयों का समाधान करेंगे।
उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने की तथा संपर्क अधिकारी एस.के. हलेमनी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। विषय विशेषज्ञों के तौर पर डॉ. मृत्युंजय  सिंह, डॉ. गोरखनाथ तिवारी, डॉ. बलविंदर कौर, डॉ. जी. नीरजा, डॉ. पूर्णिमा शर्मा, डॉ. साहिराबानू बी. बोरगल, डॉ. लक्ष्मीकांतम और डॉ. शशांक  शुक्ल इस शैक्षणिक कार्यक्रम में भाग ले रहे हैं तथा छात्रगण रंगारेड्डी, वरंगल, प्रकाशम, कृष्णा आदि अंचलों से आए हुए हैं ।
उद्घाटन समारोह में सभी वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि भूमंडलीकरण के इस दौर में शिक्षा  के त्वरित और व्यापक प्रसार के लिए दूरस्थ माध्यम वरदान के समान है। आयोजन की सफलता में के. नागेश्वर  राव, सुरेश कुमार, जे. चेन्नकेशव और बलराम का विशेष   योगदान रहा।

चित्र परिचय 1: दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा में दूरस्थ शिक्षा  संपर्क कार्यक्रम के उद्घाटन समारोह में दीप प्रज्वलन के अवसर पर डॉ. ऋषभदेव शर्मा, एस.के. हलेमनी, डॉ. पी. श्रीनिवास राव, डॉ. गोरखनाथ तिवारी, डॉ.  मृत्युंजय  सिंह, डॉ. पूर्णिमा शर्मा, डॉ. बलविंदर कौर और अन्य।

चित्र परिचय 2: दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा में दूरस्थ शिक्षा  संपर्क कार्यक्रम के उद्घाटन के अवसर पर उपस्थित (बाएँ से) डॉ. बलविंदर कौर, डॉ. पी.श्रीनिवास राव, एस.के. हलेमनी, डॉ. ऋषभदेव शर्मा, डॉ. पूर्णिमा शर्मा, के. नागेश्वर  राव एवं प्रतिभागी छात्रगण।
- पी. श्रीनिवास राव

Thursday, March 3, 2011

दूरस्थ शिक्षा पिछड़े, वंचितों व गृहिणियों तक सीमित नहीं - डॉ. भारत भूषण



धारवाड में दूरस्थ शिक्षा के विविध आयाम’ पर 
राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं कार्यशाला

- प्रो. दिलीप सिंह,
कुलसचिव, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, चेन्नई - 600 017 .

दक्षिण भारत में दूरस्थ माध्यम की शिक्षा  पर हिंदी में विचार-विमर्श  का यह पहला मौका था। देशभर में उच्चशिक्षा  को सर्वसुलभ बनाने में इस माध्यम की धाक जम चुकी है। अंग्रेजी में दूरस्थ शिक्षा की बढ़ती चुनौतियों-दिशाओं और संभावनाओं पर बातें भी होती रही हैं पर हिंदी में इन पर धारदार चर्चा धारवाड में दो दिनों की इस संगोष्ठी में 21-22 जनवरी, 2011 को की गई।


दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास की ओर से आयोजित इस संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए डेक (डिस्टेंस एजुकेशन काउंसिल ) के निदेशक डॉ. भारत भूषण ने गोष्ठी की इस खासियत पर खुशी  जाहिर करते हुए कहा कि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि दक्षिण भारत के इस सुदूर स्थान पर भारत भर के इतने विद्वान जुटेंगे और हिंदी तथा हिंदुस्तान के नज़रिए से दूरस्थ शिक्षा माध्यम की परख करेंगे। भारत भूषण जी की सराहना से अभिभूत होते हुए दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के विश्वविद्यालय विभाग के सम-कुलपति आर.एफ. नीरलकट्टी ने कहा कि ‘‘दक्षिण भारत में दूरस्थ शिक्षा माध्यम की शिक्षा  की नींव वास्तव में महात्मा गांधी ने रखी थी। गांधी जी ने हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए दक्षिण के चारों राज्यों में हिंदी शिक्षण  की ‘मुक्त परंपरा’ कायम की जिसमें धर्म, जाति, आयु और लिंग का कोई स्थान नहीं था।’’ वे यह कहने में भी नहीं हिचके कि अगर दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा को प्रोत्साहन और सहयोग मिले तो वह दूरस्थ शिक्षा  को एक सार्थक विस्तार देने में पूरी तरह समर्थ है क्योंकि सभा के पास एक बहुत बड़ा और ‘वैलनिट’ मानव-संसाधन मौजूद है।
'दूरस्थ शिक्षा के विविध आयाम’ संगोष्ठी के आगाज़ से ही इन दोनों महानुभावों के वक्तव्यों ने उत्साह बढ़ाने वाले टॉनिक का काम किया। देश के कई हिस्सों से पधारे हिंदी विद्वानों की मौजूदगी से संगोष्ठी को आगे के सत्रों में ठोस ऊँचाई हासिल हुई। ये सभी विद्वान  कहीं-न-कहीं दूरस्थ शिक्षा के सरोकारों से जुड़े हुए हैं। इन्हें संबोधित करते हुए डॉ. भारत भूषण ने एक पते की बात और कही कि विश्वविद्यालयों  में अब दूरस्थ माध्यम शिक्षा को दूसरे दर्जे की अथवा नियमित शिक्षा से कमतर स्तर की शिक्षा समझने वाली धारणा में भारी बदलाव आया है।

स्वागत भाषण देते हुए संस्थान के कुलसचिव प्रो. दिलीप सिंह ने इस ओर भी इशारा  किया कि दूरस्थ शिक्षा एक प्रकार की सु-नियोजित शिक्षा है जिसमें सामग्री और तकनीक के इस्तेमाल से गुणवत्ता सिद्ध की जाती है। उन्होंने भारत में दूरस्थ शिक्षा के प्रसार में इग्नू की भूमिका की सराहना करते हुए आम जन में इसकी स्वीकार्यता और बढ़ती हुई लोकप्रियता को रेखांकित किया। डॉ. भारत भूषण की यह टिप्पणी दोनों दिन बहस का मुद्दा बनी रही कि - ‘दूरस्थ माध्यम की शिक्षा  सिर्फ़ पिछड़ों, वंचितों या घरेलू स्त्रियों तक सीमित नहीं है। आज इसने वह मुकाम हासिल कर लिया है कि देश भर के युवक और युवतियाँ इसे नियमित शिक्षा  का एक बढ़िया विकल्प मानकर बड़ी संख्या में पूरे विश्वास  के साथ अपना रहे हैं। इतना ही नहीं कौशल  तथा दक्षता युक्त यह शिक्षा  पूरी करने के बाद वे पूरे आत्मविश्वास  के साथ समाज में अपनी ख़ास जगह भी बनाने लगे हैं।

दीप-प्रज्वलन, प्रार्थना, स्वागत-सत्कार की औपचारिकता से शुरू उदघाटन  सत्र का संचालन प्रो. ऋषभदेव शर्मा ने अपने ख़ास अंदाज में किया। धन्यवाद देते हुए उन्होंने कहा कि पिछले कुछ सालों की प्रगति और दक्षिण भारत के हिंदी प्रेमियों की मांग को देखते हुए यह विश्वास  के साथ कहा जा सकता है कि दक्षिण में  हिंदी भाषा तथा हिंदी माध्यम की उच्च शिक्षा  की सरपरस्ती आगे आनेवाले सालों में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास द्वारा ही की जाएगी।
21 जनवरी के दोनों सत्र दूरस्थ शिक्षा  माध्यम के मूलभूत आयामों पर केंद्रित थे। आज के युवा-भारत की ज़रूरतों, आकांक्षाओं और उनके सपनों को पूरा करने के लिए किन-किन दिशाओं में अपने को अग्रसर करें, कहाँ-कहाँ खुद को बदलें और किस विधि से सर्वजन सुलभ और संप्रेषणीय बनें - आदि इन दोनों सत्रों की मूल चिंताएँ थीं। भारत के कोने-कोने में दूरस्थ शिक्षा  की पहुँच हो गई हैं। ‘ड्राप आउट्स’ के लिए यह माध्यम एक वरदान है।

दूरस्थ शिक्षा  की भूमिका पर बात करते हुए डॉ. गंगा प्रसाद विमल ने यह भी चेताया कि जब लोगों का विश्वास  हमें मिलता है तब हमारी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। ‘मुक्त शिक्षा’ ने इस बात को समझा भी है और अमली जामा भी पहनाया है। वह निरंतर ‘इन्नोवेटिव’ बनी रही है। शिक्षक  और कक्षा की सीमा को इसने असीम साधनों से जोड़ कर नव्य बना दिया है। डॉ. विमल ने कहा कि जब हमारे यहाँ दूरस्थ शिक्षा  आंध्र प्रदेश, राजस्थान और इग्नू में शुरू हुई थी तो हम सोचते थे कि यह चल नहीं पाएगी; पर धीरे-धीरे हमारे जैसे लोग भी इसे उत्सुकता से देखने लगे। सच में इस शिक्षा पद्धति ने मीडिया, इन्टरनेट, कंप्यूटर, सेटेलाइट और न जाने कितने उपकरणों का उपयोग करके अपनी भूमिका को विस्तार दे दिया है। उन्होंने इस शिक्षा  की रोजगारपक प्रकृति तथा यंत्र-साधित शिक्षण  पद्धति की भूरि-भूरि सराहना करते हुए कहा कि भारतवर्ष की एक बड़ी आबादी को उच्च एवं व्यावसायिक शिक्षा  देने का काम करके दूरस्थ शिक्षा  ने यह उजागर कर दिया है कि उसकी भूमिकाएँ बहुमुखी हैं और जता दिया है कि यह ज्ञान प्रदान करने वाली निष्क्रिय शिक्षा  प्रणाली नहीं बल्कि बोध और कौशल  पैदा करने वाली सक्रिय शिक्षा पद्धति है।
'दूरस्थ शिक्षा : निर्बाध शिक्षा का अवसर' के नजरिए से डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने दूरस्थ शिक्षा  को ‘बाधा-विहीन शिक्षा' कहा क्योंकि इसे बिना किसी रुकावट के अपनाया जा सकता है - न कहीं आने-जाने की समस्या, न हाजिरी-क्लास का बंधन। खेती, मजदूरी, नौकरी, गृहस्थी के साथ यह शिक्षा जारी रखी जा सकती है। इसकी पाठ्य-सामग्री और सहायक-सामग्री अनेक तरह के शोध-संधान के बाद खास और वैज्ञानिक प्रक्रिया से इतनी संप्रेषणीय और बोधगम्य बनाई जाती है कि शिक्षार्थी की समझ भी निर्बाध गति से सही दिशा  में विकास पा सके। डॉ. शर्मा ने दूरस्थ शिक्षा  निदेशालय के आँकड़े देकर यह तथ्य सामने रखा कि इन पाठ्यक्रमों में गृहिणियों, ऑफिस कर्मचारियों, अध्यापकों की संख्या अनुपाततः कम नहीं है। उनके शब्दों में दूरस्थ शिक्षा स्वयं में निर्बाध होने के साथ-साथ किन्हीं कारणों से बाधित हो चुकी शिक्षा को जारी रख पाने का एक सुनहरा मौका भी है।

इसी क्रम में ‘हिंदी शिक्षण में दूरस्थ शिक्षा  की भूमिका' का मसला भी कम जरूरी नहीं था क्योंकि जिस संस्था के मंच पर यह विचार-मंथन आकार ले रहा था वह दक्षिण भारत में हिंदी का प्रचार-प्रसार करने वाली राष्ट्रीय महत्व की संस्था का मंच था। दक्षिण भारत और विशेष रूप से केरल प्रांत में हिंदी की उच्च शिक्षा  और शोध के जो गवाक्ष दूरस्थ शिक्षा  ने खोले हैं, उनका आकलन करते हुए प्रो. सुनीता मंजनबैल ने इस बात पर विशेष  बल दिया कि दक्षिण भारत के लिए तैयार हिंदी ‘सिम’(स्वाध्याय सामग्री) को अलग ढंग से तैयार किया जाय जैसा कि दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के दूरस्थ शिक्षा निदेशालय ने किया है। उन्होंने यह भी बताया कि दूरस्थ माध्यम के प्रसार से दक्षिण भारत में हिंदी अध्येताओं की संख्या में आशातीत वृद्धि हुई है।
पहले सत्र के आखिरी पर्चे में बी.बी. खोत ने दूरस्थ शिक्षा  के माध्यम से 'कौशल विकास' की संभावनाओं और घटकों का परिचय दिया। उनके मत में दूरस्थ शिक्षा  ‘कौशलयुक्त शिक्षा’ का सार्थक उदाहरण है। कौशल  विकास में सहायक ‘सिम लेखन की विशेष  पद्धति’, ‘प्रश्न-पत्र निर्माण’, ‘बोध-विस्तार’ आदि के उदाहरणों द्वारा श्री खोत ने यह प्रतिपादित किया कि शिक्षार्थी में कौशल  दक्षता उत्पन्न और स्थापित करना ही दूरस्थ शिक्षा का पहला और आखिरी उद्देश्य है।

दूसरा सत्र सही मायने में व्यावहारिक था क्योंकि यह सत्र पहले सत्र की प्रतिपत्तियों की परख करने वाला था। अगर दूरस्थ शिक्षा की भूमिकाओं, उसके उत्तरदायित्वों और लक्ष्यों को सर्वस्वीकार्य आयाम देने हैं तो निश्चित ही सामग्री-निर्माण, प्रश्न -निर्माण, मूल्यांकन पद्धति और परीक्षा संबंधी छात्र सुविधाओं को त्रुटिहीन, आदर्श और गुणवत्ता पुष्ट बनाना अनिवार्य होगा। ये और ऐसे ही कई मुद्दे दोपहर बाद की इस चर्चा-विमर्श  में उठे।

दूरस्थ शिक्षा  माध्यम के लिए सामग्री-निर्माण की प्रक्रिया की विशिष्टता और अधिगम संबंधी सूक्ष्मताओं की अनुकूलता पर प्रो. टी.वी. कट्टीमनी ने विचार किया। सामग्री परीक्षा और मूल्यांकन - इन तीनों के अंतस्संबंध को बनाए रखने को भी उन्होंने दूरस्थ शिक्षा प्रणाली की सफलता का मूलाधार बताया। बी.ए. और एम.ए. स्तर की हिंदी के ‘सिम’ निर्माण में समेटे जाने वाले सामयिक-विमर्शों  की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि नियमित पद्धति से दी जानेवाली हिंदी की उच्च शिक्षा  सामयिक संदर्भों, सभ्यता-विमर्श  तथा उत्तर आधुनिक चिंतन को स्थान देने में हिचकती है जबकि दूरस्थ शिक्षा की मुक्तता हिंदी पाठ्यक्रम को भी मुक्त और समीचीन बनाने का काम कर रही है।
अनुदेशन  सामग्री और ‘सिम’ के भेदोपभेदों को डॉ. हीरालाल बाछोतिया ने सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों धरातलों पर प्रस्तुत किया। उन्होंने इस बात की सराहना की कि दूरस्थ शिक्षा में खासकर इग्नू ने ‘सिम’ के लिखित पाठ को अन्य दृश्य-श्रव्य माध्यमों से सप्लीमेंट करने का अथवा फ़ेस-टु-फेस शिक्षण  को सहायक बना कर इस्तेमाल करने का जो काम किया है उसने कौशलपरक शिक्षा को एकदम नया और अनूठा आयाम प्रदान कर दिया है।

डॉ. माधव सोनटक्के ने नियमित हिंदी पाठ्यक्रमों की परंपरागत प्रश्न-निर्माण एवं मूल्यांकन पद्धति पर चुटकी लेते हुए कहा कि परीक्षा और मूल्यांकन की रूढ़िबद्धता को दूरस्थ शिक्षा  ने एक हद तक तोड़ा है। प्रश्न-पत्र निर्माण और मूल्यांकन को बोध और दक्षता के विकास में सहयोगी बनाने की अपील करते हुए उन्होंने कई उपयोगी मॉडल्स सामने रखे।

इस संदर्भ में दूरस्थ शिक्षा  निदेशालय, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के विद्यार्थियों को परीक्षा संबंधी जो सुविधाएँ दी जाती हैं उनका पारदर्शी  विवेचन श्रीमती गीता वर्मा ने किया। उन्होंने बताया कि निदेशालय की ‘सिम’ के निर्माण में देशभर के विद्वान विशेषज्ञों की मदद ली गई है । इन सबने ‘सिम’ में ही सतत मूल्यांकन के बिंदु निर्धारित कर दिए हैं  जिनको दत्त कार्य तथा प्रश्नपत्र में भी सम्मिलित करके दृढ़ीकरण की माप की जाती है। प्रश्नों  के ‘विषयपरक’ और ‘बोधपरक’ प्रकारों की भी उन्होंने चर्चा की तथा निदेशालय  के बी.ए., एम.ए., डिप्लोमा पाठ्यक्रमों के प्रश्नपत्रों से इनके उदाहरण दिए।
22 जनवरी को तीसरे सत्र में दूरस्थ शिक्षा  प्रणाली के सर्वथा नवीन आयामों पर बातचीत हुई। पहले दोनों सत्रों की अनुगूंज भी इस सत्र में सुनाई देती रही। प्रो. टी.मोहन सिंह ने कौशल  आधारित शिक्षा  के परिप्रेक्ष्य में दूरस्थ शिक्षा  का अवगाहन करते हुए ‘कौशल’ को शिक्षा और सही मायनों में शिक्षित  करने, होने का मानदंड माना। उन्होंने अर्जन, अधिगम और बोधन की अनुकूल प्राप्यता को ‘कौशल’ की कसौटी कहा तथा  आंध्र प्रदेश में हिंदी भाषा कौशल उत्पन्न करने के बीच आनेवाली समस्याओं पर विचार करते हुए इन्हें  समतल करने वाले  रास्तों की भी चर्चा की। व्यावहारिक हिंदी अर्जन पर उन्होंने हिंदी व्याकरण की जटिलता के मद्देनजर प्रकाश  डाला तथा हिंदी की शैलियों के अधिगम को ‘भाषा कौशल' के लिए जरूरी स्वीकार किया।

तकनीकी आधारित शिक्षा को दूरस्थ शिक्षा  की धुरी के रूप में व्याख्यायित करते हुए श्रीमती निधि सिंह ने तकनीकी साधित शिक्षण सामग्री निर्माण की प्रविधियों की चर्चा की। उन्होंने तकनीकी माध्यमों/उपकरणों की संभावनाओं और सीमाओं की पहचान को भी रेखांकित किया और कहा  कि इस पहचान के आलोक में ही दूरस्थ माध्यम शिक्षा के विद्यार्थियों को सहज-संप्रेषणीय शिक्षा  से जोड़ा जा सकता है। साहित्यिक एवं साहित्येतर पाठों को तकनीकीबद्ध करने की प्रचलित और अद्यतन पद्धतियों के इस्तेमाल को भी उन्होंने विविध तकनीकी उपकरणों के उपयोग से संबद्ध करके दिखाया।

इसी क्रम में डॉ. अर्जुन चव्हाण ने दूरस्थ शिक्षा  में संचार माध्यमों की उपयोगिता स्थापित की। भारत में शिक्षा संबंधी सुविधाओं के अभाव पर रोष प्रकट करते हुए प्रो. चव्हाण ने संचार माध्यमों के व्यावसायीकरण पर भी चिंता व्यक्त की। उच्च शिक्षा और संचार माध्यमों की उपादेयता की अनदेखी करनेवाली नियमित शिक्षा पद्धति को अधूरा मानते हुए उन्होंने दूरस्थ शिक्षा की इसलिए सराहना की कि यह प्रणाली संचार माध्यमों की शैक्षिक शक्ति को पहचानने वाली है और इसने ‘मीडिया’ को मनोरंजन की सीमा से निकाल कर शिक्षा-प्रसार के महत् उद्देश्य से ला जोड़ा है।
चौथा सत्र दूरस्थ शिक्षा  निदेशालय  की ‘सिम’(स्वाध्याय सामग्री) के आकलन पर केंद्रित था। हिंदी की सामग्री का श्रीमती एन. लक्ष्मी, अंग्रेजी की सामग्री का श्रीमती गीता वर्मा तथा शिक्षाशास्त्र की सामग्री का आकलन प्रो. अरविंद पांडेय ने किया। इस सत्र में प्रस्तुत विवेचन भी अत्यंत पारदर्शी थे। इस सत्र में प्रस्तुत आकलन की सफलता डॉ. भारत भूषण की समापन-सत्र में दी गई इस टिप्पणी से पुष्ट हो जाती है कि ‘मुझे प्रसन्नता है कि निदेशालय  की सामग्री दूरस्थ शिक्षा के लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए बहुत सोच-समझकर और मेहनत से बनाई गई है। सामग्री के आकलन से यह भी पता चलता है कि आपका विज़न एकदम क्लियर है और आपकी मंशा स्टूडेंट फ्रेंडली।’

22 जनवरी की शाम। समापन सत्र की अध्यक्षता डॉ. भारत भूषण ने की। संगोष्ठी की रपट प्रो. दिलीप सिंह ने प्रस्तुत की। टिप्पणीकार थे - डॉ. गंगा प्रसाद विमल, डॉ. टी.वी.कट्टीमनी, डॉ. टी. मोहन सिंह, डॉ. अर्जुन चव्हाण, डॉ.ऋषभ देव शर्मा और डॉ. हीरालाल बाछोतिया। सभी टिप्पणीकारों ने इस बात की सराहना की कि ‘दूरस्थ माध्यम शिक्षा ' पर हिंदी में और वह भी दक्षिण भारत में यह संगोष्ठी आयोजित की गई। संगोष्ठी की गंभीरता और सुगठन ने सभी को मुग्ध कर दिया था। प्रो. दिलीप सिंह ने कहा कि यह संगोष्ठी निदेशालय  के लिए मार्गदर्शक  का काम करेगी। और यह भी जोड़ा कि संगोष्ठी दूरस्थ शिक्षा  निदेशालय के कामकाज से संबद्ध उसके आंचलिक और क्षेत्रीय केंद्रों के उपस्थित कार्यकर्ताओं, अध्यापकों, संचालकों आदि के लिए एक किस्म का प्रषिक्षण भी सिद्ध हुई है। डॉ. भारत भूषण संगोष्ठी की सुचारु व्यवस्था से अत्यंत प्रसन्न थे। उन्होंने कहा कि ऐसा लग रहा है कि यह गोष्ठी आपकी नहीं बल्कि दूरस्थ शिक्षा परिषद, नई दिल्ली की है। उन्होंने संगोष्ठी में पढ़े गए कई आलेखों की सराहना भी की। उन्होंने कहा कि दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा एकनिष्ठ और उत्साही कार्यकर्ताओं से भरी-पूरी है। उन्होंने यह भी कहा कि ‘भविष्य दूरस्थ शिक्षा का ही है। सभा ने सही समय पर इस शिक्षा  प्रणाली में प्रवेश  किया है। आपकी निष्ठा और समझ को देख कर मुझे कोई संदेह नहीं है कि दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा बहुत जल्द ही दूरस्थ शिक्षा की एक अग्रणी संस्था बन कर उभरेगी।' उल्लेखनीय है कि समारोह के आरंभ में सभा के दूरस्थ शिक्षा निदेशालय द्वारा तैयार की गई स्वाध्याय सामग्री और दूरस्थ माध्यम से संपन्न एम.फिल. तथा पीएच. डी.के शोधप्रबंधों की प्रदर्शनी भी लगाई गई थी जिसका उद्घाटन डॉ. भारत भूषण ने रिबन काटकर किया.  
23 जनवरी को पुनश्चर्या पाठ्यक्रम एवं कार्यशाला का आयोजन किया गया।दूरस्थ शिक्षा निदेशालय से संबंधित चारों प्रांतों (तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, केरल और कर्नाटक) के लगभग पचास पदाधिकारी, अध्यापक एवं संगोष्ठी में देश भर से पधारे सभी विद्वान  कार्यशाला में उपस्थित थे। कार्यशाला  के मुख्यतः दो उद्देश्य  थे - एक यह कि निदेशालय के कार्यकलाप से जुड़े सभी लोग विचार-विमर्श द्वारा अपनी समस्याओं का समाधान ढूंढें, निदेशालय के स्तरीय संचालन के लिए रचनात्मक सुझाव दें तथा एक-दूसरे से बातचीत करके कुछ नया सीखें। दूसरा उद्देश्य यह था कि निदेशालय  द्वारा निर्मित हिंदी साहित्य की शिक्षण सामग्री का पुनरवलोकन करके आवश्यक  रिवीज़न का परामर्श  दिया जाय।

कार्यशाला  के उद्घाटन में सभी अतिथि विद्वानों ने अनौपचारिक टिप्पणियाँ प्रस्तुत कीं। प्रारंभ में प्रो. दिलीप सिंह ने कार्यशाला  के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए उपस्थित जन का स्वागत किया।

डॉ. भारत भूषण ने संकेत किया कि ज्ञान और चिंतन तथा भाषा और साहित्य के स्वरूप में आज इतनी तेजी से परिवर्तन आ रहे हैं कि मानविकी और साहित्य की निर्मित सामग्री को चार-पाँच साल में एक बार परिवर्धन-परिवर्तन की दृष्टि से देखा जाना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि दूरस्थ  शिक्षा  कार्यक्रम चलाने की चुनौतियाँ अलग हैं और हम सब को इसका सामना करने के लिए हमेशा  तैयार रहना चाहिए। उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि - ‘मैंने 21 की सुबह निदेशालय की ‘सिम’ की प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए आपकी सामग्री देखी और कुछ सुझाव भी दिए थे। आपकी सामग्री काफी अच्छी है पर अच्छे को और-और बेहतर बनाने की ज़रूरत हमेशा रहती है। आपके पास प्रबुद्धजनों की अनुभवी टीम है। मुझे विश्वास  है कि इस चर्चा-परिचर्चा से हम सब कुछ-न-कुछ नया सीखेंगे और अपने विद्यार्थियों को भी नया और उपयोगी दे सकेंगे।’ और फिर टीम बनाकर आठ टीमों ने वरिष्ठ विद्वानों की देखरेख में पूरे दिन चर्चाएँ कीं, समाधान ढूँढ़े और सामग्री की बेहतरी के लिए लिखित सुझाव दिए जिन्हें अगली सामग्री-संशोधन  कार्यशालाओं में ध्यान में रखकर सामग्री की गुणवत्ता में वृद्धि की जाएगी।

23 जनवरी की शाम। दूरस्थ शिक्षा पर केंद्रित तीन दिन का यह समारोह जब संपन्नता को प्राप्त हुआ तो सभी प्रतिभागी अपने-आप को संपन्नतर महसूस कर रहे थे। सभी ने इस दूरदर्शितापूर्ण  और सामयिक आयोजन के लिए दूरस्थ शिक्षा निदेशालय, उच्च शिक्षा  और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की सराहना करते हुए परस्पर विदा ली।
प्रो. दिलीप सिंह,
कुलसचिव, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, चेन्नई - 600 017 .

Saturday, January 8, 2011

विजयवाडा में दूरस्थ षिक्षा का संपर्क कार्यक्रम आयोजित

विजयवाडा, 08.01.2011 (प्रेस विज्ञप्ति)

दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा द्वारा संचालित दूरस्थ षिक्षा निदेषालय के अंतर्गत एम.ए. हिन्दी पाठ्यक्रम के आन्ध्रप्रदेष के अध्येताओं के निमित्त व्याख्यानमाला सह संपर्क कार्यक्रम  का उद्घाटन आज यहाँ वरिष्ठ हिन्दी सेवी श्री काज वेंकटेष्वर राव ने किया। मुख्य अतिथि के रूप में पधारे काजाजी ने इस अवसर पर कहा कि दूरस्थ माध्यम का प्रयोग करके दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, हिन्दी की उच्च स्तरीय षिक्षा को घर-घर पहुँचाने का जो कार्य कर रही है वह गाँधीजी के हिन्दी प्रचार आंदोलन का ही आधुनिक विस्तार है।
सहायक निदेषक डॉ. पेरिषेट्टि श्रीनिवासराव ने संपर्क कार्यक्रम की उपादेयता पर प्रकाष डालते हुए सभा के नवीनतम दूरस्थ माध्यम के पाठ्यक्रमों एम.ए. एजुकेषन, एम.फिल., पीएचडी एजुकेषन, एम.बी.ए. (ई.एम.), बी.काम., बी.बी.ए., बी.सी.ए., पीजीडीसीए, डी.सीए., और पैरामेडिकल कोर्स की जानकारी दी। डॉ. बोडेपूडि वेंकटेष्वर राव, डॉ. जी. नागेष्वर राव तथा श्री प्रसाद जी ने भी अपने विचार प्रकट किए।
उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता करते हुए प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने कहा कि दूरस्थ माध्यम आज की दुनिया में सतत् षिक्षा का सर्वोत्कृष्ट आधार है। उन्होंने षिक्षा के मौलिक अधिकार को साकार रूप देने के लिए इसे जनतांत्रिक माध्यम बताते हुए इसमें मल्टीमीडिया के कारगर इस्तेमाल की भी चर्चा की।
सप्ताह भर के इस संपर्क कार्यक्रम को उच्च षिक्षा और शोध संस्थान, नागार्जुन विष्व विद्यालय एवं आन्ध्र विष्वविद्यालय के आचार्यगण विषेषज्ञ के रूप में संबोधित करेंगे। कार्यक्रम में आन्ध्रप्रदेष के विभिन्न अंचलों के सत्तर (70) छात्र प्रतिभागी सम्मिलित हैं।
आन्ध्र सभा के शाखा व्यवस्थापक श्री वी. अजयकुमार ने समारोह का संचालन किया। धन्यवाद राघवेंद्रराव ने ज्ञापित किया।

चित्र परिचय: 
1. दूरस्थ षिक्षा संपर्क कार्यक्रम के उद्घाटन के अवसर पर बायें से वी. अजय कुमार, प्रसाद,  डॉ. जी. नागेष्वर, डॉ. ऋषभ देव शर्मा, काज वेंकटेष्वर राव (बोलते हुए) तथा डॉ. पी. श्रीनिवास राव
2. प्रतिभागी छात्र.
(डॉ. पी. श्रीनिवास राव)
   सहायक निदेषक
दूरस्थ षिक्षा निदेषालय
   विजयवाडा - कैंप


Wednesday, January 5, 2011

आलूरि बैरागी - दक्षिण के सशक्त हस्ताक्षर

चंद्र मौलेश्वर प्रसाद


हिंदी साहित्य के इतिहास में दक्षिण साहित्यकारों का उल्लेख उतना नहीं हो पाया जितने की अपेक्षा है।  ऐसे में, आलूरि बैरागी चौधरी का नाम इस बात का साक्षी है कि उनकी लेखनी ने साहित्यकारों, इतिहासकारों और पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है।  उनके जीवनकाल में केवल एक ही हिंदी कृति ‘पलायन’ नाम से प्रकाशित हुई थी।  इसी के माध्यम से हिंदी जगत में उन्होंने अपना स्थान बनाया।  

बैरागी जी का जन्म आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले के तेनाली शहर के ऐतानगर कस्बे में सन्‌ १९२५ में वेंकटरायुडु और सरस्वती के घर में हुआ जो एक प्रतिष्ठित किसान परिवार था। बचपन से ही वे स्वभाव से सीधे, सरल और स्पष्टतावादी थे। उनका व्यक्तित्व मनसा, वाचा, कर्मणा एक ही था। उनके हृदय में मानव के प्रति  अटूट आस्था थी।

बैरागी जी का बचपन तो शांतिपूर्व बीता पर बाद का जीवन संघर्षपूर्ण रहा। बीस वर्ष की आयु में वे प्रतिपाडु हाई स्कूल में अध्यापक बने। उन्होंने अपना लिखना-पढ़ना नहीं छोड़ा और अंग्रेज़ी, तेलुगु, हिंदी के साथ-साथ संस्कृत और उर्दू के भी ज्ञाता बने।  सन्‌ १९५० में उन्होंने अध्यापकी छोड़ी और मद्रास चले गए जहाँ उनके चाचा श्री चक्रपाणी एक प्रतिष्ठित एवं सुप्रसिद्ध फिल्म निर्माता थे।  उन्होंने अपनी प्रसिद्ध मासिक पत्रिका ‘चंदामामा’ के हिंदी संस्करण का कार्यभार बैरागी जी को सौंपा।  इसकी ख्याति भी एक बेचैन कवि की आत्मा को संतुष्ट नहीं कर सकी। इस नौकरी को त्याग कर दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा में डेढ़ वर्ष तक कार्य किया और फिर इसे छोड़ कर स्वतंत्र लेखन प्रारम्भ कर दिया। एक कवि का जीवन धनाभाव में संघर्षमयी तो रहेगा पर उनके स्वाभिमान ने उन्हें किसी के आगे हाथ फैलाने नहीं दिया।

बैरागी जी ने जाति, धर्म, कुल तथा देशकाल की सीमाओं से परे मनुष्य और उसके कल्याण के लिए कलम उठाई।  तभी तो उन्होंने कहा था-
रक्त स्वेद कर्दम के ऊपर
मानवता का नलिन खिला है
युग-युग के जीवन विकास में
अभ्युन्नति का पथ मिला है।
       [संशय की संध्या-पलायन-पृ.३]

हिंदी कविताओं के साथ-साथ उन्होंने तेलुगु रचनाएँ भी लिखी हैं।  उनकी हिंदी कृति ‘पलायन’ में गीत, प्रगीत और नई कविता की शैली में लिखी गई चौबीस कविताएँ संकलित हैं।  इसके अलावा उनकी अनेक उत्कृष्ठ हिंदी कविताएँ अभी तक अप्रकाशित ही रह गई हैं।  एक योजनानुसार ‘नील गगन चन्दन सा चाँद’ शीर्षक से अस्सी गीत प्रकाशित होना है।  २००७ में आलूरि बैरागी के तीन कविता संग्रहों का प्रकाशन प्रो. पी.आदेश्वर राव के प्रयासों से हुआ है।  ‘संशय की संध्या’ में उनकी बयालीस कविताएँ संग्रहित हैं।  ‘प्रीत और गीत’ संग्रह में बैरागी की सौ कविताएँ संकलित की गई हैं और ‘वसुधा का सुहाग’ में पैतालीस प्रयोगवादी कविताएँ दी गई हैं।  बैरागी की इन कविताओं में विषय वैविध्य के साथ शैली वैविध्य भी देखने को मिलता है।

बैरागी   की   कविताओं   में  कृतिक और विकासात्मक मानवतावाद की झलक देखने को मिलती है जिसे
उनकी कविता ‘रुग्ण जीवन’ की इन पंक्तियाँ देखा जा सकता है :  
यहाँ धूल का हर ज़र्रा है
किसी पवित्र रक्त से सींचा,
इसी लोक पर किसी दास ने
वैभव का हिंसा-रथ खींचा॥  

इसी प्रकार, आध्यात्मिक चेतना से ओत-प्रोत कविता की ये पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं-
रुक जा! ओ अनन्त के प्रेमी!
जीवन तुझे पुकार रहा है
तुझे लुभाने के हित ही तो
धरणी का श्रृंगार रहा है।    [जागृति गान]  

अराजकता, भ्रष्टाचार, घटते जीवन मूल्य पर मौन जनता को जब कवि देखता है तो अनायास कह उठता है-
मानवता है कहाँ अरे! यह गूंगे पशुओं की जमात है
हाँ सज-धज कर कहीं जा रही ज़िंदा लाशों की बरात है॥
                                                                   [गीतमंजरी]

बैरागी तेलुगु भाषा के भी प्रसिद्ध कवि रहे हैं।  उनकी कृति ‘आगमगीति’ को केंद्रिय साहित्य अकादमी पुरस्कृत कर चुकी है।

हिंदी, तेलुगु और अंग्रेज़ी की उनकी कितनी ही अप्रकाशित लेखनी अभी भी दिन का उजाला नहीं देख पाई।  शायद उनका स्वाभिमान ही रहा जिसके कारण उन्हें किसी के आगे हाथ फैलाकर इन्हें प्रकाशित करना मंज़ूर नहीं था।  अपने स्वाभिमान व लेखनी के बारे में बैरागी ने खुद कहा है-

यह न सोचना- हाँ, यह भी कुछ लिखता है
यश के सुवर्ण द्वार पर पड़ा पड़ा
कृपा भिक्ष की आशा रखता है॥

संदर्भ ग्रंथ- आलूरि बैरागी की कविताओं में मानवतावाद- डॉ. पेरिसेट्टि श्रीनिवास राव   

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cmpershad द्वारा कलम के लिए 12/03/2010 09:27:00 PM को पोस्ट किया गया