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‘अनामदास का पोथा’ में नारी

- डॉ. पेरिसेट्टि श्रीनिवास राव


‘अनामदास का पोथा’ द्विवेदी जी की आखिरी रचना है, मगर इसका कथानक उनकी सारी रचनाओं के कथानकों से पुराना है। यानी, द्विवेदी जी क्रमशः  पुराने (मूल) की ओर लखते चलते हैं। यद्यपि इसका कथानक छान्दोग्य पुराण का है, मगर ये ऋग्वेद काल तक को लखता है। यहाँ औरत के तीन रूप हमारे सामने आते हैं - माँ, बहन और प्रिया (जिया, जञ के ञ काय हो गया)। जिया की प्राप्ति माँ और बहन की प्राप्ति के बिना मुमकिन नहीं। माँ और बहन का जान-मान ही उसे जिया के जान-मान के लायक बनाता है। यानी, जो क्रमशः  मन से जन और जन से जनक में रूपान्तरित होता है। ये ही है ‘रैक्व आख्यान’। नारी तत्व क्या है? द्विवेदी जी के अनुसार तो नारी निषेधरूपा होती है। तात्पर्य यह है कि ‘‘जहाँ कहीं अपने आपको उत्सर्ग करने की, अपने-आपको खपा देने की भावना प्रधान है, वहीं नारी है। जहाँ कहीं दुःख-सुख की लाख-लाख धाराओं में अपने को दलित द्राक्षा के समान निचोड़ कर दूसरे को तृप्त करने की भावना प्रबल है, वहीं ‘नारी-तत्व’ है, या षास्त्रीय भाशा में कहना हो तो ‘षक्ति-तत्व’ है।’’ स्पश्ट है कि निशेध से मतलब आत्मनिशेध से है, यानी दूसरों के…

‘अक्षरा’ साहिती सांस्कृतिक सेवा पीठम् : लोकार्पण समारोह

हैदराबाद, 30 जुलाई, 2010 (प्रेस विज्ञप्ति) ‘अक्षरा’ साहिती सांस्कृतिक सेवा पीठम्, राजमंड्री के तत्वावधान मंे दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के सभाकक्ष में डॉ. पेरिसेट्टि श्रीनिवास राव द्वारा संपादित और रचित दो कृतियों का लोकार्पण समारोह संपन्न हुआ।

स्वतंत्र वार्ता के संपादक डॉ. राधेष्याम शुक्ल ने ‘आलूरि बैरागी की कविताओं में मानवतावाद’ नामक पुस्तक का लोकार्पण किया, जबकि दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के कुलसचिव प्रो. दिलीप सिंह ने ‘डॉ. हरिवंषराय बच्चन’: एक अनुषीलन’ नामक पुस्तक का लोकार्पण किया।

इस अवसर पर विचार व्यक्त करते हुए मुख्य अतिथि प्रो. दिलीप सिंह ने कहा कि आलूरि बैरागी और बच्चन दोनों ही ऐसे साहित्यकार हैं जो अपने समय में तो प्रासंगिक थे ही, वर्तमान समय में भी हमें रास्ता दिखा सकते हैं इसलिए उनकी रचनाओं पर आज के संदर्भ में पुनर्विचार अत्यंत आवष्यक है। डॉ. दिलीप सिंह ने आगे कहा कि विमोचित कृतियाँ इस दिषा में दक्षिण भारत के हिंदी अध्येताओं का स्तुत्य प्रयत्न है। उन्होंने यह भी कहा कि हमें महान कवियों के पुनर्पाठ की ओर जाने की आवष्यकता है, ताकि आज के समय से उनकी तुलना की जा सके। उन्होंन…