Wednesday, November 3, 2010

‘अनामदास का पोथा’ में नारी

- डॉ. पेरिसेट्टि श्रीनिवास राव


‘अनामदास का पोथा’ द्विवेदी जी की आखिरी रचना है, मगर इसका कथानक उनकी सारी रचनाओं के कथानकों से पुराना है। यानी, द्विवेदी जी क्रमशः  पुराने (मूल) की ओर लखते चलते हैं। यद्यपि इसका कथानक छान्दोग्य पुराण का है, मगर ये ऋग्वेद काल तक को लखता है। यहाँ औरत के तीन रूप हमारे सामने आते हैं - माँ, बहन और प्रिया (जिया, जञ के ञ काय हो गया)। जिया की प्राप्ति माँ और बहन की प्राप्ति के बिना मुमकिन नहीं। माँ और बहन का जान-मान ही उसे जिया के जान-मान के लायक बनाता है। यानी, जो क्रमशः  मन से जन और जन से जनक में रूपान्तरित होता है। ये ही है ‘रैक्व आख्यान’। नारी तत्व क्या है? द्विवेदी जी के अनुसार तो नारी निषेधरूपा होती है। तात्पर्य यह है कि ‘‘जहाँ कहीं अपने आपको उत्सर्ग करने की, अपने-आपको खपा देने की भावना प्रधान है, वहीं नारी है। जहाँ कहीं दुःख-सुख की लाख-लाख धाराओं में अपने को दलित द्राक्षा के समान निचोड़ कर दूसरे को तृप्त करने की भावना प्रबल है, वहीं ‘नारी-तत्व’ है, या षास्त्रीय भाशा में कहना हो तो ‘षक्ति-तत्व’ है।’’ स्पश्ट है कि निशेध से मतलब आत्मनिशेध से है, यानी दूसरों के लिए निरंतर अपना निशेध करना। यह भी स्पश्ट है कि द्विवेदी जी की यह मान्यता आज के नारी-विमर्ष वालों की मान्यता से भिन्न है। पष्चिम से आया हुआ यह सिद्धान्त व्यक्तिमूलक है, जिसमें दूसरों को कोई महत्व न देकर अपने व्यक्तित्व को निरंतर बढ़ाने और स्थापित करने की बात है। यानी परिवार और समाज की चिन्ता छोड़कर अपने लिए अधिक से अधिक सुख और सुविधा बटोरना। कहा जा सकता है कि इस दृश्टि से द्विवेद जी प्रतिक्रियावादी थे, लेकिन जो बात ध्यातव्य है, वह यह कि उनका नारी चिंतन समग्र हिन्दी नारी-चिन्तन के मेल में है, जो आज भले विवादास्पद हो, पर अविचारित कतई नहीं है। यहाँ यह कह देना जरूरी है कि आत्मनिशेध व्यक्तित्व निशेध नहीं है, बल्कि वह व्यक्तित्व विकास है जिनके पास व्यक्तित्व नहीं, वे आत्मनिशेध की बात भी नहीं समझेंगे।
‘अनामदास का पोथा’ में एक मूल संघर्श का सूत्रपात प्रारंभ से ही सहज ढंग से हो गया है। ‘रैक्व’ षूद्र है और उसका प्रेम षूद्र कन्या ‘जाबाला’ से है। प्रेम का आरंभ प्रथम अध्याय में आरंभ होने पर भी उपन्यासकार ने जल्दी आमने-सामने नहीं होने देता है। रैक्व की स्थिति बहुत विचित्र है। उसने कभी स्त्री जाति को देखा नहीं था। इसका चित्रण रैक्व और जाबाला के प्रथम परिचय आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अत्यन्त मार्मिक ढंग से किया है। यथा - ‘‘ऋशिकुमार ने सोचा कि अगर इसकी कुछ सहायता की जाये तो षायद जी जाये। कठिनाई यह थी कि यह दूसरा प्राणी इतने कपड़ों से और मणि-मोतियों से जड़ा हुआ था कि उनकी समझ में नहीं आया कि ये सब कपड़े क्या हैं। ये मोती-मानिक - जैसी चीज़ें इस प्राणी ने पहले से ही धारण की थी या बाद में उसके षरीर पर डाली गयी हैं। यह प्राणी निस्सन्देह मनुश्य ही था। हाथ, पैर, नाक, मुँह, देह सबकुछ मनुश्य-जैसे थे, परन्तु था कुछ विचित्र। इस प्रकार की मानवमूर्ति उन्होंने अपने जीवन में कहीं देखी नहीं थी। उनके समझ में नहीं आया कि आंधी और तूफान से जो कपड़े इधर-उधर बिखर गये हैं, उनका क्या उपयोग किया जाये। फिर भी कुछ तो करना ही चाहिए।
वे धीरे-धीरे आँखों के चारों ओर उंगली फिराकर देखने लगे कि कहीं जोड़ के चिन्ह हैं या नहीं। नहीं थे। ऋशिकुमार एकदम उसके चेहरे पर झुक गये। अवष्य ही कोई रहस्य है। उसी समय उस प्राणी की आँखें खुल गयीं। वह अचकचाकर उठ बैठा।1 रैक्व ‘स्त्री’ को देखकर ऐसे आष्चर्यचकित होकर देखते हैं कि कोई विचित्र जानवर को देखा है - ‘‘जाबाला ने कुछ उत्तर नहीं दिया। उसके कपोल-मण्डल पर लालिमा की तरंग खेल गयी। आँखें अनायास नीची हो गयी। क्या बतावे? कुछ बताने योग्य भी तो हो। वृद्ध आचार्य की अनुभवी आँखों से किषोरी के पाण्डर कपोलों पर अचानक खेल जानेवाली यह लालिमा छिप नहीं सकी। वे असमंजस में पड़ गये।’’2
तत्कालीन समय में आचार्य लोगों का बहुत सम्मान किया जाता था। रैक्व और जाबाला के परस्पर संबंध के बारे में बहुत दिन तक छुपाने के बाद माँ के सामने रहस्य खुल जाता है तब साधारण स्त्री जैसी जाबाला भी लज्जित होती है। इससे यह पता चलता है कि तत्कालीन समाज में नारी किसी भी समाज से संबंधित हो एक ही प्रकार का व्यवहार करती है यथा - ‘‘तूने? तूने उसे कब समझाया?’’
जाबाला जो बात दीर्घकाल से छिपाती आ रही थी, उसके इस तरह अचानक खुल जाने से उसका चेहरा लज्जा से लाल हो गया। परम ब्रह्मवा देनी भगवती ऋतम्भरा के मुख पर उल्लास-चंचल भाव थिरक उठे। वे एकटक उस मनोहर मुख की षोभा निहारती रही। जाबाला की आँखें झुक गयी। फिर धीरे-धीरे बोली, ‘‘मुझे ही तो वह षुभा कहता है, माँ!’’3
भारत देष में नारी के लिए माता का रूप अत्यंत आदरणीय रहा है। वह सब कुछ न्योछावर करने के लिए तैयार हो जाती है और माँ की जिम्मेदारी से हटना नहीं चाहती है। यही भारतीय नारी की महानता है। ‘अनामदास का पोथा; में ऋजुका का देहान्त होने के बावजूद भी वह सारा कश्ट सहकर जीवन यापन करती है। इसका चित्रण आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इस प्रकार किया है कि - ‘‘जाबाला ने अत्यन्त व्यथित स्वर में उससे कहा, ‘‘बहिन, मुझे क्षमा करना! मेरे कारण तेरा सौभाग्य ही नश्ट हो गया। उसके बाद भी बहुत दिनों तक तेरी खोज-खबर नहीं ले सकी। मुझसे भारी अपराध हो गया।’’
‘‘अच्छा, आप माताजी की बात कह रही हैं?’’
‘‘हाँ-हाँ, माताजी।’’
‘‘साक्षात् भगवती का रूप हैं माताजी। इतना प्यार मेरे-जैसे अभागन के प्रति! ऐसा तो कहीं देखा-सुना नहीं, दीदी रानी!’’4
पं. विद्यनिवास मिश्र के शब्दों में ‘‘परंपरागत भारतीय परिवेष में विषेश रूप से हिंदू धर्म में विवाह को संस्कार के रूप में मान्यता प्राप्त है। स्त्रियों के लिए एकमात्र संस्कार विवाह है ‘जिसे दो परिवारों को जोड़नेवाला’, ‘स्त्री पुरुश के संबंध को मान्यता प्रदान करनेवाला’ गृहस्थाश्रम में प्रवेष के लिए स्त्री-पुरुश के साहचर्य न सहधर्माचरण की भूमिका तैयार करने वाला माना जाता रहा है।’’5 (18 मई, 1955, हिंदू विवाह अधिनियम)
तत्कालीन समय में स्त्री-पुरुश संबंधों के बारे में इतने नियम हैं कि विवाह के पहले परपुरुश का स्पर्ष करना गलत या पाप माना जाता था। इसके बारे में ‘अनामदास का पोथा’ में रैक्व और जाबाला के निम्नलिखित उद्धरण से इस बात का पता चलता है - ‘‘तुम्हें देखने के बाद सब ठीक हो जायेगा, ऋशिकुमार! पर तुम मेरी एक प्रार्थना सुनो ......’’
‘‘हो क्या गया है, पाप का फल भोग रहा हूँ। तुमने कहा था न, कि किषोर को अपनी पीठ पर किसी किषोरी को बैठाने की बात सोचना भी पाप है ? मैं उस समय नहीं माना। पाप लग गया। सब समय पीठ में खुजली होती है और तुम्हारी याद आने पर तो छाती तक छेद डालती है। माताजी तो कहती थी कि यह पाप नहीं, केवल अभिलाश-भाव है, मैंने तुम्हें किसी-न-किसी प्रकार पाने की अभिलाशा की है, इसलिए पीठ में खुजली होती है; पर आष्वलायन कहता है कि यह अभिलाश-भाव भी पाप ही है, क्योंकि तुमने षुभा की स्वीकृति पाये बिना अभिलाशा की है। षुभा ही इसे ठीक कर सकती है। ठीक कर दो न षुभे, बड़ा कश्ट हो रहा है।’’6
तत्कालीन समाज ही नहीं आज़ भी भारतीय परंपरा में विवाह को पूर्णतः मान्यता मिली हुई है। विवाह के बिना स्त्री-पुरुश के समागम को अवैध मानते हैं; आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसे महान् सांस्कृतिक व्याख्याकार ने अपने ‘अनामदास का पोथा’ में इस विवाह के बारे में अपना स्वस्थ विचार व्यक्त किया है -
‘‘क्या बताऊँ तुम्हें! घर लौटो माताजी से आज्ञा लेकर विवाह करो। गन्धर्व शांत हो जायेगा।’’
‘‘विवाह!’’
‘‘हाँ, देखो, विवाह भी साम-गान है, ऐसा पुराणऋषियों ने कहा है।’’
‘‘विवाह साम-गान है? यह कैसे हो सकता है?’’
‘‘तुमने वामदेव्य साम कभी गाये जाते सुना है?’’
‘‘उन्होंने कहा था, ‘विवाह में जो आपसी बातचीत होती है वही हिंकार है; सबको सूचित करना प्रस्ताव है ; पति-पत्नी का साथ शयन उद्गीथ है, अलग-अलग शयन प्रतिहार है, प्रेमपूर्वक जीवन बिताना निधन है (निधन अर्थात् व्रत-समाप्ति)’। इस प्रकार स्त्री और पुरुश प्रेमी-युगल के रूप में वामदेव्य साम पिरोया हुआ है। यही पंचविध वामदेव्य साम है। जो व्यक्ति प्रेमी-युगल में इस प्रकार वाम-देव्य साम को जान लेता है, पुत्र-पौत्र-समन्वित हो पूर्णायु प्राप्त करता है उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है, प्रजा, पशु और कीर्ति पाकर महान् होता है।’’7
‘‘कोई स्त्री यदि प्रेमपूर्वक निकट आती है तो उसका परित्याग नहीं करना चाहिए। विवाह-सूत्र में आबद्ध होकर पवित्र दाम्पत्य व्रत का निर्वाह करना चाहिए। यह मत भूलना कि यह व्रत है!’’8 विवाह के बारे में द्विवेदी जी ने ‘अनामदास का पोथा’ में विस्तार से विचार किया है। आमतौर पर स्त्री पुरुशों के संबंध दो प्रकार के होते हैं। एक संबंध है षारीरिक भूख या कामजन्य संबंध वे इसको अवैध मानते है। दूसरा है विवाह के द्वारा जो संबंध स्थापित होते हैं उस संबंध को धर्म संगत मानते हैं और इसी का नाम विवाह कहा जाता है। ‘‘देखो, तुमने धर्मसूत्रों में षब्द पढ़े होंगे - एक विवाह है, दूसरा उद्वाह। आजकल दोनों षब्दों का एक ही अर्थ समझा जाता है। दोनों के अर्थों में कोई भेद है, इसे कोई जानता ही नहीं। विवाह धर्म-सम्मत होता है और षास्त्र के नियमों के अनुसार मान्य भी। उद्वाह भी ऐसा ही होता है, परंतु उद्वाह में पति पत्नी को और पत्नी पति को ऊपर की ओर वहन करती है, अर्थात् परस्पर की आध्यात्मिक चेतना को परिश्कृत करती है। माताजी ने बताया था कि अगर ऐसी पत्नी मिले जो आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाये, तो उससे विवाह नहीं, उद्वाह कर लेना। मेरा तो हुआ नहीं, आयुश्मान्! तुम अपना सोच लो। ‘‘रैक्व जटिल मुनि की ओर और भी जानने की इच्छा से चुचपाय ताकते रहे। जटिल मुनि ने कहा, ‘‘मैं तुम्हें विवाह की सलाह तो नहीं दूँगा, उद्वाह की सलाह अवष्य दूँगा। षास्त्रकारों ने विवाह के लिए पाणिग्रहण का विधान किया है, जबकि उद्वाह में पाणिग्रहण नहीं, उपोद्ग्रहण होता है। उपोद्ग्रहण समझे?’’9
नारी देह को देव मंदिर मानने वाले और नारी सौंदर्य को सबसे अधिक प्रभावोत्पादिनी षक्ति मानने वाले रचनाकार द्विवेदी जी ने भट्टिनी, चंद्रलेखा और जाबाला जैसी नायिकाए कल्पित की है। कालिदास की पार्वती द्विवेदी जी के लिए रूप एवं षील का प्रतिमान है। उन्होंने अनेक नारी पात्रों के रूप में वस्तुतः पार्वती ही कल्पित की हैं। ऐसी पार्वती जो हमारे समय के इतिहास की उपज है। किसी भी समय सारी दुनियाँ अपने अतीत का फल होती है। हिंदुस्तान तो मुख्य रूप से अपने अतीत का फल है। किसी अन्य देष का वर्तमान जीवन अपने अतीत के सिद्धांतों, स्मृतियों और पुराकथाओं से उतना ओतप्रोत नहीं जितना हिंदुस्तान के लोग अतीत की इन बातों को लेकर हँसते, रोते और झगड़ते हैं। और यह भी कि भारतीय संस्कृति मूलतः नदी संस्कृति है। हजारी प्रसाद द्विवेदी इन पात्रों के माध्यम से जो नारी तत्व की व्याख्याएँ की है वह अपनी जगह आज भी प्रासंगिकता को बनाए हुए है। किसी भी बहुसांस्कृतिक देष में एक परंपरा या दो परंपराएँ नहीं होती, अनगिनत परंपराएँ होती हे। एक बड़े लेखक को बहुत-सी परंपराओं से सामना करके अपने समय की रीढ़ पर ‘एक समावेषी सृजनात्मक विजन’ विकसित करना होता है जो पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने किया है।

संदर्भ
1. अनामदास का पोथा - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी - पृ.सं. 26-27
2. अनामदास का पोथा - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी - पृ.सं. 75-76
3. अनामदास का पोथा - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी - पृ.सं. 106
4. हिंदू धर्म जीवन में सनातन की खोज - विद्यानिवास मिश्र - पृ.सं. 43
5. अनामदास का पोथा - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी - पृ.सं. 131
6. अनामदास का पोथा - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी - पृ.सं. 173-174
7. अनामदास का पोथा - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी - पृ.सं. 153
8. अनामदास का पोथा - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी - पृ.सं. 153
9. अनामदास का पोथा - आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी - पृ.सं. 190

सहायक निदेशक , दूरस्थ शिक्षा  निदेशालय,  उच्च शिक्षा  और शोध  संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, खैरताबाद, हैदराबाद-500 004, मोबाइल: 09989242343, ई-मेल: srperisetti@yahoo.com

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