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दूरस्थ शिक्षा पिछड़े, वंचितों व गृहिणियों तक सीमित नहीं - डॉ. भारत भूषण

धारवाड में  ‘ दूरस्थ शिक्षा के विविध आयाम’  पर  राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं कार्यशा ला - प्रो. दिलीप सिंह, कुलसचिव, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, चेन्नई - 600 017 . दक्षिण भारत में दूरस्थ माध्यम की शिक्षा  पर हिंदी में विचार-विमर्श  का यह पहला मौका था। देशभर में उच्चशिक्षा  को सर्वसुलभ बनाने में इस माध्यम की धाक जम चुकी है। अंग्रेजी में दूरस्थ शिक्षा की बढ़ती चुनौतियों-दिशाओं और संभावनाओं पर बातें भी होती रही हैं पर हिंदी में इन पर धारदार चर्चा धारवाड में दो दिनों की इस संगोष्ठी में 21-22 जनवरी, 2011 को की गई। दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास  की ओर से आयोजित इस संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए  डेक  (डिस्टेंस एजुकेशन काउंसिल ) के निदेशक  डॉ. भारत भूषण  ने गोष्ठी की इस खासियत पर खुशी  जाहिर करते हुए कहा कि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि दक्षिण भारत के इस सुदूर स्थान पर भारत भर के इतने विद्वान जुटेंगे और हिंदी तथा हिंदुस्तान के नज़रिए से दूरस्थ शिक्षा माध्यम ...

एम ए हिंदी [दूरस्थ माध्यम] पाठ्यक्रम में तत्काल प्रवेश प्रक्रिया

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विजयवाडा में दूरस्थ षिक्षा का संपर्क कार्यक्रम आयोजित विजयवाडा, 08.01.2011 (प्रेस विज्ञप्ति) दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा द्वारा संचालित दूरस्थ षिक्षा निदेषालय के अंतर्गत एम.ए. हिन्दी पाठ्यक्रम के आन्ध्रप्रदेष के अध्येताओं के निमित्त व्याख्यानमाला सह संपर्क कार्यक्रम  का उद्घाटन आज यहाँ वरिष्ठ हिन्दी सेवी श्री काज वेंकटेष्वर राव ने किया। मुख्य अतिथि के रूप में पधारे काजाजी ने इस अवसर पर कहा कि दूरस्थ माध्यम का प्रयोग करके दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, हिन्दी की उच्च स्तरीय षिक्षा को घर-घर पहुँचाने का जो कार्य कर रही है वह गाँधीजी के हिन्दी प्रचार आंदोलन का ही आधुनिक विस्तार है। सहायक निदेषक डॉ. पेरिषेट्टि श्रीनिवासराव ने संपर्क कार्यक्रम की उपादेयता पर प्रकाष डालते हुए सभा के नवीनतम दूरस्थ माध्यम के पाठ्यक्रमों एम.ए. एजुकेषन, एम.फिल., पीएचडी एजुकेषन, एम.बी.ए. (ई.एम.), बी.काम., बी.बी.ए., बी.सी.ए., पीजीडीसीए, डी.सीए., और पैरामेडिकल कोर्स की जानकारी दी। डॉ. बोडेपूडि वेंकटेष्वर राव, डॉ. जी. नागेष्वर राव तथा श्री प्रसाद जी ने भी अपने विचार प्रकट किए। उद्घाटन समारोह क...

आलूरि बैरागी - दक्षिण के सशक्त हस्ताक्षर

आलूरि बैरागी - दक्षिण के सशक्त हस्ताक्ष र चंद्र मौलेश्वर प्रसाद हिंदी साहित्य के इतिहास में दक्षिण साहित्यकारों का उल्लेख उतना नहीं हो पाया जितने की अपेक्षा है।  ऐसे में, आलूरि बैरागी चौधरी का नाम इस बात का साक्षी है कि उनकी लेखनी ने साहित्यकारों, इतिहासकारों और पाठकों का ध्यान आकर्षित किया है।  उनके जीवनकाल में केवल एक ही हिंदी कृति ‘पलायन’ नाम से प्रकाशित हुई थी।  इसी के माध्यम से हिंदी जगत में उन्होंने अपना स्थान बनाया।   बैरागी जी का जन्म आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले के तेनाली शहर के ऐतानगर कस्बे में सन्‌ १९२५ में वेंकटरायुडु और सरस्वती के घर में हुआ जो एक प्रतिष्ठित किसान परिवार था। बचपन से ही वे स्वभाव से सीधे, सरल और स्पष्टतावादी थे। उनका व्यक्तित्व मनसा, वाचा, कर्मणा एक ही था। उनके हृदय में मानव के प्रति  अटूट आस्था थी। बैरागी जी का बचपन तो शांतिपूर्व बीता पर बाद का जीवन संघर्षपूर्ण रहा। बीस वर्ष की आयु में वे प्रतिपाडु हाई स्कूल में अध्यापक बने। उन्होंने अपना लिखना-पढ़ना नहीं छोड़ा और अंग्रेज़ी, तेलुगु, हिंदी के साथ-साथ संस्कृत और उर्दू के भी ज्ञाता ...

‘अनामदास का पोथा’ में नारी

- डॉ. पेरिसेट्टि श्रीनिवास राव ‘अनामदास का पोथा’ द्विवेदी जी की आखिरी रचना है, मगर इसका कथानक उनकी सारी रचनाओं के कथानकों से पुराना है। यानी, द्विवेदी जी क्रमशः  पुराने (मूल) की ओर लखते चलते हैं। यद्यपि इसका कथानक छान्दोग्य पुराण का है, मगर ये ऋग्वेद काल तक को लखता है। यहाँ औरत के तीन रूप हमारे सामने आते हैं - माँ, बहन और प्रिया (जिया, जञ के ञ काय हो गया)। जिया की प्राप्ति माँ और बहन की प्राप्ति के बिना मुमकिन नहीं। माँ और बहन का जान-मान ही उसे जिया के जान-मान के लायक बनाता है। यानी, जो क्रमशः  मन से जन और जन से जनक में रूपान्तरित होता है। ये ही है ‘रैक्व आख्यान’। नारी तत्व क्या है? द्विवेदी जी के अनुसार तो नारी निषेधरूपा होती है। तात्पर्य यह है कि ‘‘जहाँ कहीं अपने आपको उत्सर्ग करने की, अपने-आपको खपा देने की भावना प्रधान है, वहीं नारी है। जहाँ कहीं दुःख-सुख की लाख-लाख धाराओं में अपने को दलित द्राक्षा के समान निचोड़ कर दूसरे को तृप्त करने की भावना प्रबल है, वहीं ‘नारी-तत्व’ है, या षास्त्रीय भाशा में कहना हो तो ‘षक्ति-तत्व’ है।’’ स्पश्ट है कि निशेध से मतलब आत्मनिशेध से है, य...

‘अक्षरा’ साहिती सांस्कृतिक सेवा पीठम् : लोकार्पण समारोह

हैदराबाद, 30 जुलाई, 2010 (प्रेस विज्ञप्ति) ‘अक्षरा’ साहिती सांस्कृतिक सेवा पीठम्, राजमंड्री के तत्वावधान मंे दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के सभाकक्ष में डॉ. पेरिसेट्टि श्रीनिवास राव द्वारा संपादित और रचित दो कृतियों का लोकार्पण समारोह संपन्न हुआ। स्वतंत्र वार्ता के संपादक डॉ. राधेष्याम शुक्ल ने ‘आलूरि बैरागी की कविताओं में मानवतावाद’ नामक पुस्तक का लोकार्पण किया, जबकि दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के कुलसचिव प्रो. दिलीप सिंह ने ‘डॉ. हरिवंषराय बच्चन’: एक अनुषीलन’ नामक पुस्तक का लोकार्पण किया। इस अवसर पर विचार व्यक्त करते हुए मुख्य अतिथि प्रो. दिलीप सिंह ने कहा कि आलूरि बैरागी और बच्चन दोनों ही ऐसे साहित्यकार हैं जो अपने समय में तो प्रासंगिक थे ही, वर्तमान समय में भी हमें रास्ता दिखा सकते हैं इसलिए उनकी रचनाओं पर आज के संदर्भ में पुनर्विचार अत्यंत आवष्यक है। डॉ. दिलीप सिंह ने आगे कहा कि विमोचित कृतियाँ इस दिषा में दक्षिण भारत के हिंदी अध्येताओं का स्तुत्य प्रयत्न है। उन्होंने यह भी कहा कि हमें महान कवियों के पुनर्पाठ की ओर जाने की आवष्यकता है, ताकि आज के समय से उनकी तुलना की जा सके। ...